भाग 1 से 4

 *अनाथ जवानी (कहानी)*

"राजू, तुम्हें अपने पापा की हालत के बारे में कुछ पता भी है।"

नंदा काकी के ये शब्द लगातार राजू के कानों में गूंज रहे थे।

लगभग आज से दो वर्ष पूर्व उनसे फोन पर आखरी बार राजू की बात हुई थी।

फोन उठाते ही प्रणाम पापा बोलने पर आशीर्वाद की जगह उन्होंने काफी गुस्से में सवाल दागना शुरू कर दिया था।

और कितना दिन लगेगा ?

पापा मेरे एसएससी का रिजल्ट आने ही वाला है।

वह तो कई वर्षों से आ रहा है।

पापा रेलवे का एग्जाम भी बहुत अच्छा गया है।

तेरा एग्जाम खराब कब जाता है ?

पापा शिक्षक नियोजन का काउंसलिंग कैंप भी लगने वाला है।

हां, मैं जानता हूं चुनाव आने तक उसका कुछ नहीं होगा।

पापा मैं कोशिश तो कर रहा हूं।

मुझे खूब पता है तू क्या कोशिश कर रहा है ?

पापा तीन बार बैंक के आईबीपीएस का एग्जाम निकाल चुका हूं। इंटरव्यू के लिए कॉल नहीं आया तो क्या करूं ।

जहर खिला कर मार दे हम सबको...

पापा ऐसे मत बोलिए। मैं आत्महत्या कर लूंगा।

तू क्यों मरेगा, तेरी क्या गलती है। गलती तो मैंने किया है, जो तेरी पढ़ाई में खुद को बर्बाद कर लिया। तेरे मां के इलाज के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं। जवान बेटी को कितने दिनों तक घर में बिठा कर रखूं। घर से बाहर निकलने पर महाजन को मुंह दिखाने में शर्म आती है। बनिया, डीलर, दूधवाला, बैंक का मैनेजर सब देखते ही खड़ी खोटी सुनाने लगते हैं और कितने बुरे दिन तूं दिखाएगा...

तो पापा मैं क्या करूं ?

मुझे क्या पता कि क्या करना होगा। मैं खुद पांचवीं तक पढ़ा हूं। लेकिन तुझे बचपन से कॉन्वेंट में पढ़ाया। साइंस से इंटर कराया। वह पैसा नहीं था, इसलिए मजबूरी में बीए में आर्ट्स लेने बोला और बता मैं क्या कर सकता था।

पापा मेरे जैसे पटना में हजारों छात्र हैं।

हां, अब तो तुम यही बोलोगे। आखिर किसका बेटा गांव से पटना जाकर कंपीटिशन का तैयारी कर रहा है। एक मैं ही होशियार निकला, जिसका सजा भुगत रहा हूं।

राजू लगभग रोने की स्थिति में आकर भर्राए आवाज में बोलता है तो ठीक है "मैं प्राइवेट नौकरी कर लेता हूं।"

पापा यह सुनकर और भी बिगड़ गए। अरे पागल कितना तनख्वाह कमा लेगा प्राइवेट नौकरी से...

पापा शुरू में पांच से सात हजार मिल जाएगा।

क्या होगा उससे। चार हजार तो तेरा ही महीने का खर्च है। 

मैं दो हजार में काम चला लूंगा। पांच हजार आपको भेज दूंगा।

अबे निखट्टू ! तेरी पढ़ाई के लिए मैंने जो अब तक दो लाख कर्ज उठाया है, उसका दस हजार महीना तो ब्याज भर रहा हूं। महीना में तेरे पांच हजार भेजने से क्या होगा ? इतना तो अब्दुल का गंवार बेटा पंचर साट कर कमा लेता है। फिर तुझे इतना पढ़ा कर क्या मिला मुझे...? फेंकना का बेटा पंजाब में चावल फैक्ट्री में सुपर वाइजर बन कर पंद्रह हजार कमाता है। 

राजू ने बड़ी हिम्मत से पापा को बीच में रोकते हुए बोला "आप मुझे कोई बिजनेस ही करा दीजिए।"

अब तो उन्होंने लगभग चिल्लाते हुए बोला "सबकुछ तो लूटा चुका, अब बिजनेस क्या अपनी किडनी बेच कर कराऊं। 

अब राजू लगभग फफकते हुए बोला "पापा तो आप ही बताओ, मैं क्या करूं। पिछले पांच वर्षों से किसी तरह एक टाइम खा कर कंपीटिशन की सारी किताबें रट चुका हूं। ट्यूशन की कमाई से आने वाले सारे पैसे, फॉर्म भरने और एग्जाम देने में खर्च हो जाता है। पहनने को अच्छे कपड़े नहीं होने के कारण मैं बार बार इंटरव्यू में फेल कर दिया जाता हूं। आप ही बताइए, आखिर मैं क्या करूं ? अगर आप भी ऐसे बात करेंगे तो मैं मर जाऊंगा"

हां, तूं मर जा, तेरे जैसा नालायक बेटा के जिंदा रहने से क्या फायदा और फोन कट जाता है।

इसके बाद राजू दहाड़ मार कर रोने लगता है। उसकी उस रूह कंपाने वाली आवाज को सुनने वाला उसके अंधेरे कमरे में कोई नहीं होता है। 

 इसके बाद दुबारा उसके घर से कोई फोन नहीं आया और उसने भी मन ही मन ठान लिया था कि जब तक अच्छी सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी वह भी घर फोन नहीं करेगा। कुछ रिश्तेदार अगर फोन भी करते तो हाल चाल कम पूछते और बेरोजगारी का ताना ज्यादा मारते थे। धीरे धीरे राजू ने सबका फोन उठाना बंद कर दिया और कुछ दिनों बाद फोन आना भी बंद हो गया।

कहते हैं कि आदमी की परछाई मरने के बाद भी उसका साथ नहीं छोड़ता है लेकिन जिंदगी जब अंधकार में हो, तो यह परछाई भी आदमी का साथ छोड़ देता है। अपने पुराने ख्यालों में कदमकुआं के एक तंग कमरे के घनघोर अंधकार में बैठे राजू के हैंडसेट से एक बार फिर नंदा काकी की आवाज आती है...

राजू। क्या तुम्हें अपने पिता की हालत बता है।

और जवाब में राजू सिर्फ इतना ही बोल पाता है "काकी मैं अनाथ हूं"

मैं बिल्कुल अनाथ हूं और फिर वह अपने मेट्रिक से स्नातक तक की प्रथम श्रेणी की सभी डिग्रियां, कंप्यूटर और टाइपिंग की डिप्लोमा और प्रतियोगिता परीक्षा के सभी एडमिट कार्ड आग के हवाले कर हमारे देश की सरकार की तरह सदा सदा के लिए एक गहरी नींद में सो जाता है।


*अनाथ जवानी -2*


✍🏽 *बिपिन कुमार चौधरी*


आठ लड़का और तीन लड़कियों के पिता अब्दुल के घर आज कुछ ज्यादा ही चहल पहल थी। दरअसल आज उसके तीसरे बेटे अंजार के बड़े बेटा रॉकी का सुन्नत होना था। अब तक मुखिया सरपंच और गांव ग्राम के अन्य गणमान लोगों सहित लगभग दो से ज्यादा लोगों का उनके दरवाजे पर जमघट लगा चुका था। सभी मेहमान चिकन बिरयानी, मटन और अन्य लजीज व्यंजन का खूब आनंद उठा रहे थे। इसके बावजूद अब्दुल की निगाहें बेसब्री से अपने सुभाष भैया को खोज रहा था। उसने अपने बड़े बेटे मुर्शीद और सज्जाद को दसवीं बार आवाज लगा कर पूछा " अरे मुर्शीद, रे सज्जाद,!अरे सुभाष चाचा अभी तक केहने नाय ऐले छो"। 

मुर्शीद ने जवाब दिया " सुभाष चाचा क कहलअ छिए। चार दिन पहले से रोज सांझ क दुकान बंद करे समय रोज याद कराए दे रहिए...। चाची क कई बार कहलअ छिए लेकिन कहलअ रहे चाचा बीमार रहे छौन। तबीयत ठीक रहते त जयथन...।

अब्दुल अपने बेटे के इस जवाब से और भी नाराज होकर बोला "तों सनी कोय करम र आदमी नाय छैं। से कि होय गेले सुभाष भैया क, हमरा से पांच वर्ष उमरी में छोटे होते।

मुर्शीद ने अपने अब्बा और सुभाष चाचा के मोहब्बत को काफी करीब से देखा था। इसलिए वह सर झुका कर चुप रहा लेकिन अपने दोस्तों के सामने इस बैज्जती से सज्जाद बिल्कुल आग बबुला हो गया और गुस्सा कर बोला "तब जा न, तोहिं बोलाय क ले आनअ, एके आदमी क तो बिहाने स नाम रटी रहलअ छअ। 

अब्दुल सज्जाद के इस जवाब से और भी क्रोधित हो गए। रे सज्जादवा, मुंह संभारी क बोल। नाय त दू लाठी में दिमाग जगह पर आवी जैतो और इतना बोल कर अपने बुढ़ापे की लाठी पटकते हुए अपने सुभाष भैया की घर की ओर चल दिया।


सुभाष भैया अपने इकलौते बेरोजगार पुत्र राजू से पिछले दो सालों से बात नहीं करने, आर्थिक तंगी, बेटी स्वाति के विवाह, पत्नी सुमिंत्रा की बीमारी और अपने उम्र के बोझ तले सही मायने में काफी बीमार रहते थे लेकिन अब्दुल की नजरों में वह काफी भले आदमी थे। बहुत ज्यादा समय पहले की बात नहीं है, जब गांव में एक समृद्ध किसान के रूप में उनकी तूती बोलती थी। अपने दरवाजे पर मदद को आने वाले हर शख्स को सुभाष भैया दिल खोल कर मदद करते थे। आज तक उन्होंने अपने दिए पैसे के एवज में कभी किसी से ब्याज नहीं लिया था लेकिन वख्त की मार देखिए आज कल के लौंडे अपने बाप के दिए मामूली राशि के ब्याज की खातिर बीच चौंक पर उन्हें बैज्जत करने में जरा भी नहीं शरमाते हैं। पिछले शनिवार हटिया के दिन बाबू साहब का बड़का बेटा चौपटा ने तो बेशर्मी की सारी हदें लांघ दी थी। जबकि उनके एहसानों के तले दबे उनके बाप का सुभाष चाचा के सामने जुबान भी नहीं खुलता है। अब अब्दुल को ही ले लीजिए, सुभाष भैया का ना जाने उस पर कितना एहसान है ...

*अनाथ जवानी -3*


✍🏽 *बिपिन कुमार चौधरी*


ईंट भट्ठे में मजदूरों के लिए अस्थाई रूप से बने मकान में अब्दुल अपने पांच बच्चों के साथ गुजारा किया करता था। उस समय उनके बड़े बेटा की उम्र लगभग सात वर्ष के आस पास की थी। पांचवे नंबर का बेटा दो माह का था। ईंट भट्ठा के आस पास सामान्य से अधिक गर्मी पड़ना आम बात था। वैशाख और जेठ की तपती धूप में दुधमुहे बच्चे को पीठ पर लाद कर अब्दुल की पत्नी उसके साथ जी तोड़ मेहनत किया करती थी। पति पत्नी दिन रात कठिन परिश्रम के बावजूद इतना ही ईंट बना पाते थे, जिससे बड़ी मुश्किल से परिवार को दो वक्त की रोटी नसीब हो पाती थी। ऐसे में अगर कोई बच्चा बीमार पड़ जाए तो भट्ठा मालिक के मेहरबानी से तीन चार खुराक की दवाई चौंक पर मेडिकल वाले भैया से मिल जाए तो ठीक नहीं तो फिर अल्लाह की जैसी इच्छा। यही कारण है कि अब्दुल और उसकी पत्नी बड़े ध्यान से पांच वक्त का नमाज अता करते थे। रोज रोज मस्जिद जाना तो संभव नहीं हो पाता था लेकिन जुम्मा का नमाज़ अब्दुल तीन किलोमीटर पैदल चलकर नजदीक के मस्जिद में अता करता था। इसी से उसे अपनी बिरादरी के कुछ लोगों से जान पहचान हो गई थी। मस्जिद के मौलवी साहब से भी अब्दुल घुल मिल गया था और उसके एक एक शब्द अब्दुल के लिए अल्लाह ताला के साक्षात आदेश के समान होता था। कहते हैं, अगर खुदा पर यकीन हो तो जिंदगी की तमाम कठिनाइयों को झेलने का हिम्मत आदमी को उसकी मेहरबानी से मिल ही जाता है। मौलवी साहब के अनुसार अगर कोई बंदा दिल से नमाज अता करता है और अल्लाह के बनाए उसूलों का पालन करता है तो इसके बहुत फायदे होते हैं। पहला तो उसके जीवन में कोई परेशानी नहीं आता है और दूसरा अगर परेशान आता है तो अल्लाह खुद अपने किसी नेक बंदे को उसकी मदद के लिए भेजकर अपने इबादत कर्ता की परेशानियों का माकूल हल निकालता है। अब्दुल अपने जीवन के तमाम तकलीफों के बावजूद अल्लाह के भरोसे अपनी जिंदगी काट रहा था। इसी दौरान उसकी पत्नी काफी गंभीर रूप से बीमार हो गई। पहले नीम हकीम और मौलवी मौलाना का सहारा लिया गया लेकिन स्थिति नहीं सुधरने पर जुम्मे के नमाज के बाद उसे जानने वाले सभी लोगों ने चंदा कर कुछ पैसे अब्दुल को दिया। इन पैसों को लेकर अब्दुल अपनी पत्नी का ईलाज कटिहार के एक अच्छे डॉक्टर से करवाता है और अल्लाह की कृपा से उसकी पत्नी दस दिनों तक दवाई खाने के बाद ठीक हो जाती है लेकिन लंबी बीमारी के कारण वह काफी कमजोर हो जाती है। अब्दुल एक बार फिर से अल्लाह का शुक्रिया अता करता है और दिलो जान से मेहनत कर ईंट बनाने लगता है। अभी कुछ दिन हुए होंगे कि बाढ़ का पानी आ जाने से ईंट निर्माण का काम बंद हो जाता है। अब्दुल के साथ के मजदूर अपने गांव लौट जाते हैं लेकिन बीमार पत्नी और छोटे छोटे पांच बच्चों को साथ लेकर वापस लौटना अब्दुल को अब्दुल को आत्महत्या जैसा लगता है। तभी उसके दिमाग में आइडिया आता है कि क्यों ना यहीं रुक कर किसानों के खेत में मजदूरी किया जाए लेकिन समस्या यह है कि उसे खेती में मजदूरी का ज्यादा कुछ ज्ञान नहीं होता है। फिर खेतिहर मजदूरों की मजदूरी भी ईंट भट्ठा के मजदूरों से कम होता है। तभी उसकी नजर भट्ठा में ईंट खरीदने आए सुभाष भैया पर पड़ती है। वह उन्हें जाकर सलाम करता है और बोलता है भैया कुछ काम मिलेगा क्या ? बारिश के मौसम और बाढ़ के पानी के कारण ईंट निर्माण तो तीन चार महीने के लिए बंद हो गया है। सुभाष बाबू उसे नीचे से ऊपर तक घूरते हैं और पूछते हैं भट्ठा में कितना कमा लेते थे।

भैया पति पत्नी मिलकर रोज सौ रुपए कमा लेता था लेकिन अभी पत्नी बीमार है तो सत्तर रुपए तक कमा लेता हूं।

सत्तर रूपया !!!

हमारे गांव में तो पच्चीस रुपया रोज पर मजदूर मिलता है।

भैया, मैं यहां पंद्रह घंटे तक काम करता हूं। आपके लिए भी दिन रात काम करूंगा।

देखो भाई, सत्तर रुपया तो बहुत दूर की बात है लेकिन अगर तुम काम करना चाहो तो तुम्हें तीस रुपया रोज दे सकता हूं। हां, लेकिन याद रखना यह बात गांव में किसी को पता नहीं चलना चाहिए। नहीं तो सभी किसान मजदूरी का रेट खराब करने के लिए, मुझसे झगड़ा करने आ जाएंगे। 

ठीक है भैया...

हां, एक बात और...

जी भैया!!

मेरी पत्नी को सिर्फ बीस रुपया बताना, नहीं तो वह काफी गुस्सा होगी कि बाहर से वह भी मुसलमान मजदूर को मैंने काम पर क्यों रख लिया ?

ठीक है भैया!!!

तो ठीक है, कल से ओघरा घाट में मेरे कामत पर समय से आ जाना।

जी भैया!!

अगर किसी प्रकार का दिक्कत हो तो, सुभाष बाबू का कामत पूछ लेना।

जी भैया!!

अब्दुल ने अल्लाह का लाख लाख शुक्रिया अदा किया और यह खुशखबरी अपनी पत्नी को सुनाने अपनी झोपड़ी की ओर दौड़ पड़ा ...


*अनाथ जवानी -4*


✍🏽 *बिपिन कुमार चौधरी*


अगले दिन प्रातः सात बजे जब अब्दुल सुभाष बाबू के कामत पहुंचा तो देखा कि सुभाष बाबू खुद ही अपने गाय और बछड़े को चारा डाल रहे थे। उससे कुछ ही दूरी पर उनकी धर्मपत्नी धान के पुआल की कुट्टी काट रही थी। उनके दोनों बच्चे राजू और स्वाति बैंगन खेत से ज्यादा से ज्यादा बैंगन तोड़ने का खेल खेल रहे थे। राजू गांव के इतने संपन्न परिवार को सुबह सात बजे से ही काम करता देख दंग रह गया। उस समय राजू की उम्र पांच वर्ष और उसके बहन की उम्र चार वर्ष से थोड़ा कम ही रही होगी। तभी सुभाष बाबू की नजर अब्दुल से मिली तो उसने हाथ जोड़ कर सलाम किया। 

सुभाष बाबू ने भी अब्दुल का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए बोला "आओ भाई, आओ..., 

क्या नाम बताया था कल तुमने अपना ?

साहब आपने तो मेरा नाम कल पूछा ही नहीं!

अरे भाई तो अब बता दो।

भैया, मुझ सेवक को लोग अब्दुल पुकारते हैं।

किसका सेवक ? कैसा सेवक ?

अरे भाई तुम मेरे गांव के लिए दूर देश से आए एक मेहमान हो। 

नहीं साहब! मैं तो एक साधारण मजदूर हूं और आपकी बड़ी मेहरबानी जो आपने मुझे अपनी खिदमत का मौका दिया है।

सुभाष बाबू थोड़ा नाराज होकर बोले, "देखो भाई, यहां कोई किसी का मालिक और कोई किसी का सेवक नहीं है।"

तुम उम्र में भी मुझसे कुछ बड़े लगते हो। इसलिए मुझे सुभाष बोला करो। 

दोनों आदमी अभी बात कर ही रहे थे कि सुभाष बाबू की धर्मपत्नी चाय ले आई। 

अब्दुल ने सुभाष बाबू और उनकी पत्नी की काफी जिद्द पर शरमाते हुए चाय का कप अपने हाथों में ले लिया।

चाय पीने के बाद, सुभाष बाबू ने कहा चलो अब्दुल मैं तुम्हें अपने खेत घुमा दूं।

जी मालिक!

और फिर दोनों पगडंडियों और खेत के आड़ के सहारे कामत से काफी दूर निकल गए।

इस दौरान सुभाष बाबू ने अपना दो बीघा गेहूं और ढ़ाई बीघा मक्का का खेत दिखाया। दस कट्ठा में लगे बगीचा, कामत के आस पास लगे सब्जी का खेत और दो कट्ठा में लगे बांस के खेत का भी सैर कराया। 

अब्दुल ने महसूस किया कि सुभाष बाबू का सभी फ़सल अन्य किसानों के फसलों से काफी बेहतर है। कामत पर बंधा गाय बछड़ा भी गांव के अन्य पशुओं की अपेक्षा हृष्ट पुष्ट है। कामत के आस पास लगे सब्जी के खेतों में जंगल का नामो निशान भी नहीं है। 

बांस बिट्टी थोड़ा उजाड़ था। इसके बारे में जब सुभाष बाबू से पूछा गया तो बोले "देखो अब्दुल, माना कि बांस बिट्टी मेरा है लेकिन अगर किसी का घर टूट जाए तो क्या हम उसके मदद के लिए तौल भाव करेंगे। अरे भाई, इस धरती पर सबको समान रूप से घर बना कर रहने का अधिकार है। इसलिए मैंने अपना बांस बिट्टा गांव के लोगों को फ्री कर दिया है। जिसे भी जरूरत होता है, वह अपनी जरूरत के हिसाब से दो चार बांस काट लेता है।"

यह बात पास ही गोबर पाथ रही उनकी धर्मपत्नी ने सुन लिया।

गुस्से से आग बबूला होकर बोली, "हां, भर गांव में आप ही एगो दरभंगा महाराज हैं। पिछले महीना अपना गोहाल बनाने के समय तो बारह टका गोटा बांस खरीद कर पचास बांस लाए थे। लेकिन अपना बिट्टा में बांस है तो सब आदमी का घर बनना चाहिए। हमारा तो कर्म फूट गया है। एगो समान मांग कर लाने बोलो तो इनका प्रतिष्ठा जाने लगता है लेकिन लुटाने के समय दोनों हाथ खोल कर लूटा देंगे। 

दो गो बच्चा को कैसे पढ़ाना लिखाना है। घर में एगो बेटी है, उसके लिए कैसे दो रुपया जोड़े, ई सबसे तो कोई मतलब नहीं है। बस सबका भला होना चाहिए।

सुभाष बाबू बीच में टोकते हुए, अरे सब होगा। तुम काहे चिंता करती हो। भोला बाबा सब पार लगाएंगे। 

हां, हमरो किस्मत में एगो भोला बाबा लिखा था तो क्या करें। होगा तो होगा नहीं होगा तो आपके लिए भांग धतूरा थकूचेंगे। इतना बोलकर वह घर की चली गई।

इसके बाद सुभाष बाबू ने अब्दुल को अपने दोनों बच्चे से मिलाया।

दोनों पास में ही स्लेट पेंसिल लिए बैठे थे।

राजू ने बड़े ही खूबसूरत अक्षरों में ए से जेड तक लिखा था तो स्वाति स्लेट पर एक अजीब आकृति बना कर अब्दुल को दिखाते हुए बोली "देखो चाचा, मेरा गेंदा फूल बढ़िया है न"

अब्दुल मुस्कुराते हुए बोला, "हां बिटिया रानी बहुत बढ़िया है"

फिर सुभाष बाबू को दिखा कर बोली "देखो पापा, मैंने कितना बढ़िया फूल बनाया है।"

पापा ने भी गोद में उठा कर हां में सिर हिलाया।

तभी राजू गुस्से में बोला , "अरे बकलोल! मेरा सब पेंसिल स्लेट में घस घस कर बरबाद कर दी।

स्वाति ने भी बिना देर लगाए अपनी तोतली जुबान में जवाब दिया। हम बकलोल नहीं, तुम गधा है।

हम चंदा मामा को बोल देंगे, हमको ढेर सारा पेंसिल भेज देगा और तुमको रात में भूत पकड़ कर ले जायेगा।

इतना सुन कर अब्दुल और सुभाष बाबू हंस पड़े और स्वाति दौड़ती हुई अपने मां के पास घर की ओर चली गई...

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