कर्म का फल (लघु कथा)

*कर्म का फल (लघु कथा)*

✍🏽 *बिपिन कुमार चौधरी*

"मां गुब्बारा दिला दो।"
"बेटा, गुब्बारा तो कुछ देर में फुट जायेगा।"
"खिलौने ही दिलवा दो।"
"मेरा बेटा शेर है ना और शेर मिट्टी के खिलौने से नहीं खेलता है।"
"अच्छा छोड़ो, आइस्क्रीम ही खरीद दो।"
"इससे तो दांत खराब हो जाता है, बेटा।"
कुछ दूर आगे बढ़ने पर "मिठाई तो दिलवा दो।"
"मिठाई तो पूजा के बाद ही मिलेगा, बेटा।"
एक घंटा लाइन में खड़ा रहने के बाद महिला अपने बच्चे के साथ मंदिर के गेट तक पहुंचती है। 
"दक्षिणा निकालो, जजमान!"
"बाबा मेरे पास सिर्फ पचास रुपए हैं।"
"मां के दरबार में झूठ नहीं बोलना चाहिए।"
"सच बोल रहा हूं बाबा।"
"ठीक है, चल वही निकाल, वैसे भी बाबा को बिना दक्षिणा दिए, पूजा सफल नहीं होता है।"
महिला एक नजर अपने बेटे की ओर देखती है। फिर हाथ जोड़ कर मां शेरावाली को देखती है।
"अगले पल बाबा को अपने पल्लू से सौ रुपया निकाल कर दे देती है लेकिन मंदिर के अंदर गए बिना वापस लौट आती है।"
मंदिर से कुछ दूरी पर पुजारी का बेटा अन्य बच्चों के साथ मिठाई और आइसक्रीम का लुफ्त उठा रहा होता है। उसका बेटा भी अब मिठाई की जिद्द कर, रोने पीटने लगता है। 
मां उसे बार बार दिलासा देती है कि घर पर तेरे लिए बहुत सारी मिठाईयां हैं लेकिन बच्चा नहीं मानता है।
"मां, बच्चे को जोरदार थप्पड़ लगाती है।"
बच्चा चीख चीख कर मेला में शोर करने लगता है। "तुम झूठी हो, मैं तुम्हें छोड़ कर चला जाऊंगा।"
अचानक बच्चा मेला में गुम हो जाता है। फिर वह अनाउंसमेंट कराने मंदिर के गेट पर उसी बाबा के पास पहुंचती है।
बाबा दुखी होते हैं। "यह कैसे हुआ बेटी ?"
महिला फूट फूट कर रोने लगती है। "बाबा आपने ठीक ही कहा था, मां के दरबार में झूठ नहीं बोलना चाहिए लेकिन मैं तो मां होकर अपने ही बेटे से लगातार झूठ बोल रही थी।"
बाबा कुछ समझते, इससे पहले महिला रोते रोते बेहोश होकर मंदिर के दहलीज पर बेसुध गिर पड़ती है।

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